श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

गावो हिरण्यं वासांसि मधु मध्वन्‍नमादृताः।

ब्राह्मणेभ्यो ददुः सर्वे देवो नः प्रीयतामिति॥ ३

gāvo hiraṇyaṃ vāsāṃsi madhu madhvannamādṛtāḥ|

brāhmaṇebhyo daduḥ sarve devo naḥ prīyatāmiti|| 3

अर्थ

वहाँ उन्होंने आदरपूर्वक गौएँ, सोना, वस्त्र, मधु और मधुर अन्‍न ब्राह्मणोंको दिये तथा उनको खिलाया-पिलाया। वे केवल यही चाहते थे कि इनसे देवाधिदेव भगवान् शंकर हमपर प्रसन्‍न हों॥ ३॥✎ 2091

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2091 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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