॥ श्रीहरिः ॥
प्रपन्नोऽस्मि महायोगिन् महापुरुष सत्पते।
अनुजानीहि मां देव सर्वलोकेश्वरेश्वर॥ १६
prapanno'smi mahāyogin mahāpuruṣa satpate|
anujānīhi māṃ deva sarvalokeśvareśvara|| 16
अर्थ
भक्तवत्सल! महायोगेश्वर पुरुषोत्तम! मैं आपकी शरणमें हूँ। इन्द्रादि समस्त लोकेश्वरोंके परमेश्वर! स्वयंप्रकाश परमात्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये॥ १६॥
प्रपन्नोऽस्मि महायोगिन् महापुरुष सत्पते।
अनुजानीहि मां देव सर्वलोकेश्वरेश्वर॥ १६
भक्तवत्सल! महायोगेश्वर पुरुषोत्तम! मैं आपकी शरणमें हूँ। इन्द्रादि समस्त लोकेश्वरोंके परमेश्वर! स्वयंप्रकाश परमात्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 348) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/34/16/