श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

ऋषीन् विरूपानंगिरसः प्राहसं रूपदर्पितः।

तैरिमां प्रापितो योनिं प्रलब्धैः स्वेन पाप्मना॥ १३

ṛṣīn virūpānaṃgirasaḥ prāhasaṃ rūpadarpitaḥ|

tairimāṃ prāpito yoniṃ pralabdhaiḥ svena pāpmanā|| 13

अर्थ

एक दिन मैंने अंगिरा गोत्रके कुरूप ऋषियोंको देखा। अपने सौन्दर्यके घमंडसे मैंने उनकी हँसी उड़ायी। मेरे इस अपराधसे कुपित होकर उन लोगोंने मुझे अजगरयोनिमें जानेका शाप दे दिया। यह मेरे पापोंका ही फल था॥ १३॥

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