‘तुम कौन हो? तुम्हारे अंग-अंगसे सुन्दरता फूटी पड़ती है। तुम देखनेमें बड़े अद्भुत जान पड़ते हो। तुम्हें यह अत्यन्त निन्दनीय अजगरयोनि क्यों प्राप्त हुई थी? अवश्य ही तुम्हें विवश होकर इसमें आना पड़ा होगा’॥ ११॥
को भवान् परया लक्ष्म्या रोचतेऽद्भुतदर्शनः।
कथं जुगुप्सितामेतां गतिं वा प्रापितोऽवशः॥ ११
‘तुम कौन हो? तुम्हारे अंग-अंगसे सुन्दरता फूटी पड़ती है। तुम देखनेमें बड़े अद्भुत जान पड़ते हो। तुम्हें यह अत्यन्त निन्दनीय अजगरयोनि क्यों प्राप्त हुई थी? अवश्य ही तुम्हें विवश होकर इसमें आना पड़ा होगा’॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 348) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/34/11/