श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्‍वराणां च साहसम्।

तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा॥ ३०

dharmavyatikramo dṛṣṭa īśvarāṇāṃ ca sāhasam|

tejīyasāṃ na doṣāya vahneḥ sarvabhujo yathā|| 30

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—सूर्य, अग्‍नि आदि ईश्‍वर (समर्थ) कभी-कभी धर्मका उल्लंघन और साहसका काम करते देखे जाते हैं। परंतु उन कामोंसे उन तेजस्वी पुरुषोंको कोई दोष नहीं होता। देखो, अग्‍नि सब कुछ खा जाता है, परन्तु उन पदार्थोंके दोषसे लिप्त नहीं होता॥ ३०॥

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