श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

ततश्‍च कृष्णोपवने जलस्थल-

प्रसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे ।

चचार भृङ्गप्रमदागणावृतो

यथा मदच्युद् द्विरदः करेणुभिः॥ २५

tataśca kṛṣṇopavane jalasthala-

prasūnagandhānilajuṣṭadiktaṭe |

cacāra bhṛṅgapramadāgaṇāvṛto

yathā madacyud dviradaḥ kareṇubhiḥ|| 25

अर्थ

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण व्रजयुवतियों और भौंरोंकी भीड़से घिरे हुए यमुनातटके उपवनमें गये। वह बड़ा ही रमणीय था। उसके चारों ओर जल और स्थलमें बड़ी सुन्दर सुगन्धवाले फूल खिले हुए थे। उनकी सुवास लेकर मन्द-मन्द वायु चल रही थी। उसमें भगवान् इस प्रकार विचरण करने लगे, जैसे मदमत्त गजराज हथिनियोंके झुंडके साथ घूम रहा हो॥ २५॥✎ 1669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1669 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: झिल-मिला → झिलमिला

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