श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

काचिदञ्जलिनागृह्णात्तन्वी ताम्बूलचर्वितम्।

एका तदङ्‌घ्रिकमलं सन्तप्ता स्तनयोरधात्॥ ५

kācidañjalināgṛhṇāttanvī tāmbūlacarvitam|

ekā tadaṅghrikamalaṃ santaptā stanayoradhāt|| 5

अर्थ

तीसरी सुन्दरीने भगवान्‌का चबाया हुआ पान अपने हाथोंमें ले लिया। चौथी गोपी, जिसके हृदयमें भगवान्‌के विरहसे बड़ी जलन हो रही थी, बैठ गयी और उनके चरणकमलोंको अपने वक्षःस्थलपर रख लिया॥ ५॥

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