श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

नाहं तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून्

भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये ।

यथाधनो लब्धधने विनष्टे

तच्चिन्तयान्यन्‍निभृतो न वेद॥ २०

nāhaṃ tu sakhyo bhajato'pi jantūn

bhajāmyamīṣāmanuvṛttivṛttaye |

yathādhano labdhadhane vinaṣṭe

taccintayānyannibhṛto na veda|| 20

अर्थ

गोपियो! मैं तो प्रेम करनेवालोंसे भी प्रेमका वैसा व्यवहार नहीं करता, जैसा करना चाहिये। मैं ऐसा केवल इसीलिये करता हूँ कि उनकी चित्तवृत्ति और भी मुझमें लगे, निरन्तर लगी ही रहे। जैसे निर्धन पुरुषको कभी बहुत-सा धन मिल जाय और फिर खो जाय तो उसका हृदय खोये हुए धनकी चिन्तासे भर जाता है, वैसे ही मैं भी मिल-मिलकर छिप-छिप जाता हूँ॥ २०॥✎ 1668 2089

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1668 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वालोंसे → करनेवालोंसे
  • #2089 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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