श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

मिथो भजन्ति ये सख्यः स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते।

न तत्र सौहृदं धर्मः स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा॥ १७

mitho bhajanti ye sakhyaḥ svārthaikāntodyamā hi te|

na tatra sauhṛdaṃ dharmaḥ svārthārthaṃ taddhi nānyathā|| 17

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—मेरी प्रिय सखियो! जो प्रेम करनेपर प्रेम करते हैं, उनका तो सारा उद्योग स्वार्थको लेकर है। लेन-देनमात्र है। न तो उनमें सौहार्द है और न तो धर्म। उनका प्रेम केवल स्वार्थके लिये ही है; इसके अतिरिक्त उनका और कोई प्रयोजन नहीं है॥ १७॥✎ 1668 2089

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1668 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वालोंसे → करनेवालोंसे
  • #2089 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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