श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

शरदुदाशये साधुजातसत्

सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।

सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका

वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ २

śaradudāśaye sādhujātasat

sarasijodaraśrīmuṣā dṛśā|

suratanātha te'śulkadāsikā

varada nighnato neha kiṃ vadhaḥ|| 2

अर्थ

हमारे प्रेमपूर्ण हृदयके स्वामी! हम तुम्हारी बिना मोलकी दासी हैं। तुम शरत्कालीन जलाशयमें सुन्दर-से-सुन्दर सरसिजकी कर्णिकाके सौन्दर्यको चुरानेवाले नेत्रोंसे हमें घायल कर चुके हो। हमारे मनोरथ पूर्ण करनेवाले प्राणेश्‍वर! क्या नेत्रोंसे मारना वध नहीं है? अस्त्रोंसे हत्या करना ही वध है?॥ २॥

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