श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता

विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्।

पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि-

र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन्॥ ४

gāyantya uccairamumeva saṃhatā

vicikyurunmattakavad vanād vanam|

papracchurākāśavadantaraṃ bahi-

rbhūteṣu santaṃ puruṣaṃ vanaspatīn|| 4

अर्थ

वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढने लगीं। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परन्तु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे—पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं॥ ४॥

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