श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

रेमे तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डितः।

कामिनां दर्शयन् दैन्यं स्त्रीणां चैव दुरात्मताम्॥ ३५

reme tayā cātmarata ātmārāmo'pyakhaṇḍitaḥ|

kāmināṃ darśayan dainyaṃ strīṇāṃ caiva durātmatām|| 35

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट और पूर्ण हैं। जब वे अखण्ड हैं, उनमें दूसरा कोई है ही नहीं, तब उनमें कामकी कल्पना कैसे हो सकती है? फिर भी उन्होंने कामियोंकी दीनता-स्त्रीपरवशता और स्त्रियोंकी कुटिलता दिखलाते हुए वहाँ उस गोपीके साथ एकान्तमें क्रीडा की थी—एक खेल रचा था॥ ३५॥

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