यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखायी देते। मालूम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुन्दरने देखा होगा कि मेरी प्रेयसीके सुकुमार चरणकमलोंमें घासकी नोक गड़ती होगी; इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर चढ़ा लिया होगा॥ ३१॥
न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नूनं तृणांकुरैः।
खिद्यत्सुजाताङ्घ्रितलामुन्निन्ये प्रेयसीं प्रियः॥ ३१
यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखायी देते। मालूम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुन्दरने देखा होगा कि मेरी प्रेयसीके सुकुमार चरणकमलोंमें घासकी नोक गड़ती होगी; इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर चढ़ा लिया होगा॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 321) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/31/