श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ववौ वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः।

अ‌ग्‍नयश्‍च द्विजातीनां शान्तास्तत्र समिन्धत॥ ४

vavau vāyuḥ sukhasparśaḥ puṇyagandhavahaḥ śuciḥ|

agnayaśca dvijātīnāṃ śāntāstatra samindhata|| 4

अर्थ

उस समय परम पवित्र और शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु अपने स्पर्शसे लोगोंको सुखदान करती हुई बह रही थी। ब्राह्मणोंके अग्‍निहोत्रकी कभी न बुझनेवाली अग्‍नियाँ जो कंसके अत्याचारसे बुझ गयी थीं, वे इस समय अपने-आप जल उठीं॥ ४॥✎ 1653

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1653 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-होत्रकी → अग्‍निहोत्रकी

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें