श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया

बिभर्षि शुक्लं खलु वर्णमात्मनः।

सर्गाय रक्तं रजसोपबृंहितं

कृष्णं च वर्णं तमसा जनात्यये॥ २०

sa tvaṃ trilokasthitaye svamāyayā

bibharṣi śuklaṃ khalu varṇamātmanaḥ|

sargāya raktaṃ rajasopabṛṃhitaṃ

kṛṣṇaṃ ca varṇaṃ tamasā janātyaye|| 20

अर्थ

आप ही तीनों लोकोंकी रक्षा करनेके लिये अपनी मायासे सत्त्वमय शुक्लवर्ण (पोषणकारी विष्णुरूप) धारण करते हैं, उत्पत्तिके लिये रजःप्रधान रक्तवर्ण (सृजनकारी ब्रह्मारूप) और प्रलयके समय तमोगुणप्रधान कृष्णवर्ण (संहारकारी रुद्ररूप) स्वीकार करते हैं॥ २०॥

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