दिशाएँ स्वच्छ प्रसन्न थीं। निर्मल आकाशमें तारे जगमगा रहे थे। पृथ्वीके बड़े-बड़े नगर, छोटे-छोटे गाँव, अहीरोंकी बस्तियाँ और हीरे आदिकी खानें मंगलमय हो रही थीं॥ २॥✎ 1653
दिशः प्रसेदुर्गगनं निर्मलोडुगणोदयम्।
मही मंगलभूयिष्ठपुरग्रामव्रजाकरा॥ २
दिशाएँ स्वच्छ प्रसन्न थीं। निर्मल आकाशमें तारे जगमगा रहे थे। पृथ्वीके बड़े-बड़े नगर, छोटे-छोटे गाँव, अहीरोंकी बस्तियाँ और हीरे आदिकी खानें मंगलमय हो रही थीं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.3.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 135) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/3/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)