श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स विस्मयोत्फुल्लविलोचनो हरिं

सुतं विलोक्यानकदुन्दुभिस्तदा।

कृष्णावतारोत्सवसम्भ्रमोऽस्पृशन्

मुदा द्विजेभ्योऽयुतमाप्लुतो गवाम्॥ ११

sa vismayotphullavilocano hariṃ

sutaṃ vilokyānakadundubhistadā|

kṛṣṇāvatārotsavasambhramo'spṛśan

mudā dvijebhyo'yutamāpluto gavām|| 11

अर्थ

जब वसुदेवजीने देखा कि मेरे पुत्रके रूपमें तो स्वयं भगवान् ही आये हैं, तब पहले तो उन्हें असीम आश्‍चर्य हुआ; फिर आनन्दसे उनकी आँखें खिल उठीं। उनका रोम-रोम परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गया। श्रीकृष्णका जन्मोत्सव मनानेकी उतावलीमें उन्होंने उसी समय ब्राह्मणोंके लिये दस हजार गायोंका संकल्प कर दिया॥ ११॥✎ 2056

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2056 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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