श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अन्तर्गृहगताः काश्‍चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः।

कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः॥ ९

antargṛhagatāḥ kāścid gopyo'labdhavinirgamāḥ|

kṛṣṇaṃ tadbhāvanāyuktā dadhyurmīlitalocanāḥ|| 9

अर्थ

परीक्षित्! उस समय कुछ गोपियाँ घरोंके भीतर थीं। उन्हें बाहर निकलनेका मार्ग ही न मिला। तब उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और बड़ी तन्मयतासे श्रीकृष्णके सौन्दर्य, माधुर्य और लीलाओंका ध्यान करने लगीं॥ ९॥

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