श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तन्‍नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽङ्‌घ्रिमूलं

प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः।

त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकाम-

तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम्॥ ३८

tannaḥ prasīda vṛjinārdana te'ṅghrimūlaṃ

prāptā visṛjya vasatīstvadupāsanāśāḥ|

tvatsundarasmitanirīkṣaṇatīvrakāma-

taptātmanāṃ puruṣabhūṣaṇa dehi dāsyam|| 38

अर्थ

भगवन्! अबतक जिसने भी तुम्हारे चरणोंकी शरण ली, उसके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये। अब तुम हमपर कृपा करो। हमें भी अपने प्रसादका भाजन बनाओ। हम तुम्हारी सेवा करनेकी आशा-अभिलाषासे घर, गाँव, कुटुम्ब—सब कुछ छोड़कर तुम्हारे युगल चरणोंकी शरणमें आयी हैं। प्रियतम! वहाँ तो तुम्हारी आराधनाके लिये अवकाश ही नहीं है। पुरुषभूषण! पुरुषोत्तम! तुम्हारी मधुर मुसकान और चारु चितवनने हमारे हृदयमें प्रेमकी—मिलनकी आकांक्षाकी आग धधका दी है; हमारा रोम-रोम उससे जल रहा है। तुम हमें अपनी दासीके रूपमें स्वीकार कर लो। हमें अपनी सेवाका अवसर दो॥ ३८॥

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