श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

न चैवं विस्मयः कार्यो भवता भगवत्यजे।

योगेश्‍वरेश्‍वरे कृष्णे यत एतद् विमुच्यते॥ १६

na caivaṃ vismayaḥ kāryo bhavatā bhagavatyaje|

yogeśvareśvare kṛṣṇe yata etad vimucyate|| 16

अर्थ

परीक्षित्! तुम्हारे-जैसे परम भागवत भगवान्‌का रहस्य जाननेवाले भक्तको श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिये। योगेश्‍वरोंके भी ईश्‍वर अजन्मा भगवान्‌के लिये भी यह कोई आश्‍चर्यकी बात है? अरे! उनके संकल्पमात्रसे—भौंहोंके इशारेसे सारे जगत‍्का परम कल्याण हो सकता है॥ १६॥✎ 887 888

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #887 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #888 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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