श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

कुतो नु तद्धेतव ईश तत्कृता

लोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः।

तथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति

धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय॥ ५

kuto nu taddhetava īśa tatkṛtā

lobhādayo ye'budhaliṅgabhāvāḥ|

tathāpi daṇḍaṃ bhagavān bibharti

dharmasya guptyai khalanigrahāya|| 5

अर्थ

जब आपका सम्बन्ध अज्ञान और उसके कारण प्रतीत होनेवाले देहादिसे है ही नहीं, फिर उन देह आदिकी प्राप्तिके कारण तथा उन्हींसे होनेवाले लोभ-क्रोध आदि दोष तो आपमें हो ही कैसे सकते हैं? प्रभो! इन दोषोंका होना तो अज्ञानका लक्षण है। इस प्रकार यद्यपि अज्ञान और उससे होनेवाले जगत‍्से आपका कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी धर्मकी रक्षा और दुष्टोंका दमन करनेके लिये आप अवतार ग्रहण करते हैं और निग्रह-अनुग्रह भी करते हैं॥ ५॥

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