श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

ततोऽनुरक्तैः पशुपैः परिश्रितो

राजन् स गोष्ठं सबलोऽव्रजद्धरिः।

तथाविधान्यस्य कृतानि गोपिका

गायन्त्य ईयुर्मुदिता हृदिस्पृशः॥ ३३

tato'nuraktaiḥ paśupaiḥ pariśrito

rājan sa goṣṭhaṃ sabalo'vrajaddhariḥ|

tathāvidhānyasya kṛtāni gopikā

gāyantya īyurmuditā hṛdispṛśaḥ|| 33

अर्थ

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने व्रजकी यात्रा की। उनके बगलमें बलरामजी चल रहे थे और उनके प्रेमी ग्वालबाल उनकी सेवा कर रहे थे। उनके साथ ही प्रेममयी गोपियाँ भी अपने हृदयको आकर्षित करनेवाले, उसमें प्रेम जगानेवाले भगवान्‌की गोवर्द्धन-धारण आदि लीलाओंका गान करती हुई बड़े आनन्दसे व्रजमें लौट आयीं॥ ३३॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे
पूर्वार्धे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥

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