श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

क्षुत्तृड्व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभिः।

वीक्ष्यमाणो दधावद्रिं१ सप्ताहं नाचलत् पदात्॥ २३

kṣuttṛḍvyathāṃ sukhāpekṣāṃ hitvā tairvrajavāsibhiḥ|

vīkṣyamāṇo dadhāvadriṃ saptāhaṃ nācalat padāt|| 23

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने सब व्रजवासियोंके देखते-देखते भूख-प्यासकी पीड़ा, आराम-विश्रामकी आवश्यकता आदि सब कुछ भुलाकर सात दिनतक लगातार उस पर्वतको उठाये रखा। वे एक डग भी वहाँसे इधर-उधर नहीं हुए॥ २३॥✎ 885

टिप्पणियाँ

  1. १

    धाराद्रिं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 296)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #885 शब्दोंके बीचका स्थान: रहगये। → रह गये।

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