श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारिणाम्।

इन्द्रः प्राचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहेशमान्युत॥ २

gaṇaṃ sāṃvartakaṃ nāma meghānāṃ cāntakāriṇām|

indraḥ prācodayat kruddho vākyaṃ cāheśamānyuta|| 2

अर्थ

इन्द्रको अपने पदका बड़ा घमण्ड था, वे समझते थे कि मैं ही त्रिलोकीका ईश्‍वर हूँ। उन्होंने क्रोधसे तिलमिलाकर प्रलय करनेवाले मेघोंके सांवर्तक नामक गणको व्रजपर चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी और कहा—॥ २॥

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