श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

कृष्णस्त्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः।

शैलोऽस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः॥ ३५

kṛṣṇastvanyatamaṃ rūpaṃ gopaviśrambhaṇaṃ gataḥ|

śailo'smīti bruvan bhūri balimādad bṛhadvapuḥ|| 35

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण गोपोंको विश्‍वास दिलानेके लिये गिरिराजके ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये, तथा ‘मैं गिरिराज हूँ’ इस प्रकार कहते हुए सारी सामग्री आरोगने लगे॥ ३५॥✎ 2080

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2080 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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