॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.24.3
कथ्यतां मे पितः कोऽयं सम्भ्रमो व उपागतः।
किं फलं कस्य चोद्देशः केन वा साध्यते मखः॥ ३
kathyatāṃ me pitaḥ ko'yaṃ sambhramo va upāgataḥ|
kiṃ phalaṃ kasya coddeśaḥ kena vā sādhyate makhaḥ|| 3
अर्थ
‘पिताजी! आपलोगोंके सामने यह कौन-सा बड़ा भारी काम, कौन-सा उत्सव आ पहुँचा है? इसका फल क्या है? किस उद्देश्यसे, कौन लोग, किन साधनोंके द्वारा यह यज्ञ किया करते हैं? पिताजी! आप मुझे यह अवश्य बतलाइये॥ ३॥