॥ श्रीहरिः ॥
कृषिवाणिज्यगोरक्षा१ कुसीदं तुर्यमुच्यते।
वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्॥ २१
kṛṣivāṇijyagorakṣā kusīdaṃ turyamucyate|
vārtā caturvidhā tatra vayaṃ govṛttayo'niśam|| 21
अर्थ
वैश्योंकी वार्तावृत्ति चार प्रकारकी है—कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और ब्याज लेना। हमलोग उन चारोंमेंसे एक केवल गोपालन ही सदासे करते आये हैं॥ २१॥
कृषिवाणिज्यगोरक्षा कुसीदं तुर्यमुच्यते।
वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्॥ २१
वैश्योंकी वार्तावृत्ति चार प्रकारकी है—कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और ब्याज लेना। हमलोग उन चारोंमेंसे एक केवल गोपालन ही सदासे करते आये हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.24.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 291) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/24/21/टिप्पणियाँ
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रक्ष्यं।
(मुद्रित पृष्ठ 291)