श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

आजीव्यैकतरं भावं यस्त्वन्यमुपजीवति।

न तस्माद् विन्दते क्षेमं जारं नार्यसती यथा॥ १९

ājīvyaikataraṃ bhāvaṃ yastvanyamupajīvati|

na tasmād vindate kṣemaṃ jāraṃ nāryasatī yathā|| 19

अर्थ

जैसे अपने विवाहित पतिको छोड़कर जार पतिका सेवन करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्री कभी शान्तिलाभ नहीं करती, वैसे ही जो मनुष्य अपनी आजीविका चलानेवाले एक देवताको छोड़कर किसी दूसरेकी उपासना करते हैं, उससे उन्हें कभी सुख नहीं मिलता॥ १९॥

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