श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

इति ते भगवद्याच्ञां शृण्वन्तोऽपि न शुश्रुवुः।

क्षुद्राशा भूरिकर्माणो बालिशा वृद्धमानिनः॥ ९

iti te bhagavadyācñāṃ śṛṇvanto'pi na śuśruvuḥ|

kṣudrāśā bhūrikarmāṇo bāliśā vṛddhamāninaḥ|| 9

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार भगवान्‌के अन्‍न माँगनेकी बात सुनकर भी उन ब्राह्मणोंने उसपर कोई ध्यान नहीं दिया। वे चाहते थे स्वर्गादि तुच्छ फल और उनके लिये बड़े-बड़े कर्मोंमें उलझे हुए थे। सच पूछो तो वे ब्राह्मण ज्ञानकी दृष्टिसे थे बालक ही, परन्तु अपनेको बड़ा ज्ञानवृद्ध मानते थे॥ ९॥

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