didṛkṣavo'pyacyutayoḥ kaṃsād bhītā na cācalan|| 52
अर्थ
परीक्षित्! उन ब्राह्मणोंने श्रीकृष्णका तिरस्कार किया था। अतः उन्हें अपने अपराधकी स्मृतिसे बड़ा पश्चात्ताप हुआ और उनके हृदयमें श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनकी बड़ी इच्छा भी हुई; परन्तु कंसके डरके मारे वे उनका दर्शन करने न जा सके॥ ५२॥
इति स्वाघमनुस्मृत्य कृष्णे ते कृतहेलनाः।
दिदृक्षवोऽप्यच्युतयोः कंसाद् भीता न चाचलन्॥ ५२
परीक्षित्! उन ब्राह्मणोंने श्रीकृष्णका तिरस्कार किया था। अतः उन्हें अपने अपराधकी स्मृतिसे बड़ा पश्चात्ताप हुआ और उनके हृदयमें श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनकी बड़ी इच्छा भी हुई; परन्तु कंसके डरके मारे वे उनका दर्शन करने न जा सके॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 289) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/23/52/