श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नमस्तुभ्यं२ भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।

यन्मायामोहितधियो भ्रमामः कर्मवर्त्मसु॥ ५०

namastubhyaṃ bhagavate kṛṣṇāyākuṇṭhamedhase|

yanmāyāmohitadhiyo bhramāmaḥ karmavartmasu|| 50

अर्थ

प्रभो! आप अचिन्त्य और अनन्त ऐश्‍वर्योंके स्वामी हैं! श्रीकृष्ण! आपका ज्ञान अबाध है। आपकी ही मायासे हमारी बुद्धि मोहित हो रही है और हम कर्मोंके पचड़ेमें भटक रहे हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं॥ ५०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    स्तस्मै।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 288)

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