श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अन्यथा पूर्णकामस्य कैवल्याद्याशिषां पतेः।

ईशितव्यैः किमस्माभिरीशस्यैतद् विडम्बनम्॥ ४५

anyathā pūrṇakāmasya kaivalyādyāśiṣāṃ pateḥ|

īśitavyaiḥ kimasmābhirīśasyaitad viḍambanam|| 45

अर्थ

भगवान् स्वयं पूर्णकाम हैं और कैवल्यमोक्षपर्यन्त जितनी भी कामनाएँ होती हैं, उनको पूर्ण करनेवाले हैं। यदि हमें सचेत नहीं करना होता तो उनका हम-सरीखे क्षुद्र जीवोंसे प्रयोजन ही क्या हो सकता था? अवश्य ही उन्होंने इसी उद्देश्यसे माँगनेका बहाना बनाया। अन्यथा उन्हें माँगनेकी भला क्या आवश्यकता थी?॥ ४५॥

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