श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

धिग् जन्म नस्त्रिवृद् विद्यां धिग् व्रतं धिग् बहुज्ञताम्।

धिक् कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे॥ ३९

dhig janma nastrivṛd vidyāṃ dhig vrataṃ dhig bahujñatām|

dhik kulaṃ dhik kriyādākṣyaṃ vimukhā ye tvadhokṣaje|| 39

अर्थ

वे कहने लगे—हाय! हम भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख हैं। बड़े ऊँचे कुलमें हमारा जन्म हुआ, गायत्री ग्रहण करके हम द्विजाति हुए, वेदाध्ययन करके हमने बड़े-बड़े यज्ञ किये; परन्तु वह सब किस कामका? धिक्कार है! धिक्कार है!! हमारी विद्या व्यर्थ गयी, हमारे व्रत बुरे सिद्ध हुए। हमारी इस बहुज्ञताको धिक्कार है! ऊँचे वंशमें जन्म लेना, कर्मकाण्डमें निपुण होना किसी काम न आया। इन्हें बार-बार धिक्कार है॥ ३९॥

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