श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

पत्‍न्य ऊचुः

मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं

सत्यं कुरुष्व निगमं तव पादमूलम्।

प्राप्ता वयं तुलसिदाम पदावसृष्टं

केशैर्निवोढुमतिलंघ्य१ समस्तबन्धून्॥ २९

maivaṃ vibho'rhati bhavān gadituṃ nṛśaṃsaṃ

satyaṃ kuruṣva nigamaṃ tava pādamūlam|

prāptā vayaṃ tulasidāma padāvasṛṣṭaṃ

keśairnivoḍhumatilaṃghya samastabandhūn|| 29

अर्थ

ब्राह्मणपत्‍नियोंने कहा—अन्तर्यामी श्यामसुन्दर! आपकी यह बात निष्ठुरतासे पूर्ण है। आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। श्रुतियाँ कहती हैं कि जो एक बार भगवान्‌को प्राप्त हो जाता है, उसे फिर संसारमें नहीं लौटना पड़ता। आप अपनी यह वेदवाणी सत्य कीजिये। हम अपने समस्त सगे-सम्बन्धियोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके आपके चरणोंमें इसलिये आयी हैं कि आपके चरणोंसे गिरी हुई तुलसीकी माला अपने केशोंमें धारण करें॥ २९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    र्निरोद्धुमभिलंघ्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 285)

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