श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

प्रायः श्रुतप्रियतमोदयकर्णपूरै-

र्यस्मिन् निम‌ग्‍नमनसस्तमथाक्षिरन्ध्रैः।

अन्तः प्रवेश्य सुचिरं परिरभ्य तापं

प्राज्ञं यथाभिमतयो विजहुर्नरेन्द्र॥ २३

prāyaḥ śrutapriyatamodayakarṇapūrai-

ryasmin nimagnamanasastamathākṣirandhraiḥ|

antaḥ praveśya suciraṃ parirabhya tāpaṃ

prājñaṃ yathābhimatayo vijahurnarendra|| 23

अर्थ

परीक्षित्! अबतक अपने प्रियतम श्यामसुन्दरके गुण और लीलाएँ अपने कानोंसे सुन-सुनकर उन्होंने अपने मनको उन्हींके प्रेमके रंगमें रँग डाला था, उसीमें सराबोर कर दिया था। अब नेत्रोंके मार्गसे उन्हें भीतर ले जाकर बहुत देरतक वे मन-ही-मन उनका आलिंगन करती रहीं और इस प्रकार उन्होंने अपने हृदयकी जलन शान्त की—ठीक वैसे ही, जैसे जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंकी वृत्तियाँ ‘यह मैं, यह मेरा’ इस भावसे जलती रहती हैं, परन्तु सुषुप्ति-अवस्थामें उसके अभिमानी प्राज्ञको पाकर उसीमें लीन हो जाती हैं और उनकी सारी जलन मिट जाती है॥ २३॥

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