अबकी बार ग्वालबाल पत्नीशालामें गये। वहाँ जाकर देखा तो ब्राह्मणोंकी पत्नियाँ सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और गहनोंसे सज-धजकर बैठी हैं। उन्होंने द्विजपत्नियोंको प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यह बात कही—॥ १५॥
गत्वाथ पत्नीशालायां दृष्ट्वाऽऽसीनाः स्वलंकृताः।
नत्वा द्विजसतीर्गोपाः प्रश्रिता इदमब्रुवन्॥ १५
अबकी बार ग्वालबाल पत्नीशालामें गये। वहाँ जाकर देखा तो ब्राह्मणोंकी पत्नियाँ सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और गहनोंसे सज-धजकर बैठी हैं। उन्होंने द्विजपत्नियोंको प्रणाम करके बड़ी नम्रतासे यह बात कही—॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 283) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/23/15/