श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

ततो जलाशयात् सर्वा दारिकाः शीतवेपिताः।

पाणिभ्यां योनिमाच्छाद्य प्रोत्तेरुः शीतकर्शिताः॥ १७

tato jalāśayāt sarvā dārikāḥ śītavepitāḥ|

pāṇibhyāṃ yonimācchādya protteruḥ śītakarśitāḥ|| 17

अर्थ

परीक्षित्! वे कुमारियाँ ठंडसे ठिठुर रही थीं, काँप रही थीं। भगवान्‌की ऐसी बात सुनकर वे अपने दोनों हाथोंसे गुप्त अंगोंको छिपाकर यमुनाजीसे बाहर निकलीं। उस समय ठंड उन्हें बहुत ही सता रही थी॥ १७॥

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