परीक्षित्! वे कुमारियाँ ठंडसे ठिठुर रही थीं, काँप रही थीं। भगवान्की ऐसी बात सुनकर वे अपने दोनों हाथोंसे गुप्त अंगोंको छिपाकर यमुनाजीसे बाहर निकलीं। उस समय ठंड उन्हें बहुत ही सता रही थी॥ १७॥
ततो जलाशयात् सर्वा दारिकाः शीतवेपिताः।
पाणिभ्यां योनिमाच्छाद्य प्रोत्तेरुः शीतकर्शिताः॥ १७
परीक्षित्! वे कुमारियाँ ठंडसे ठिठुर रही थीं, काँप रही थीं। भगवान्की ऐसी बात सुनकर वे अपने दोनों हाथोंसे गुप्त अंगोंको छिपाकर यमुनाजीसे बाहर निकलीं। उस समय ठंड उन्हें बहुत ही सता रही थी॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 272) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/17/