व्रीडिताः प्रेक्ष्य चान्योन्यं जातहासा न निर्ययुः॥ १२
tasya tat kṣvelitaṃ dṛṣṭvā gopyaḥ premapariplutāḥ|
vrīḍitāḥ prekṣya cānyonyaṃ jātahāsā na niryayuḥ|| 12
अर्थ
भगवान्की यह हँसी-मसखरी देखकर गोपियोंका हृदय प्रेमसे सराबोर हो गया। वे तनिक सकुचाकर एक-दूसरीकी ओर देखने और मुसकराने लगीं। जलसे बाहर नहीं निकलीं॥ १२॥✎ 1981
तस्य तत् क्ष्वेलितं दृष्ट्वा गोप्यः प्रेमपरिप्लुताः।
व्रीडिताः प्रेक्ष्य चान्योन्यं जातहासा न निर्ययुः॥ १२
भगवान्की यह हँसी-मसखरी देखकर गोपियोंका हृदय प्रेमसे सराबोर हो गया। वे तनिक सकुचाकर एक-दूसरीकी ओर देखने और मुसकराने लगीं। जलसे बाहर नहीं निकलीं॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 272) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1981 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ठंढे → ठंडे