श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार-

वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः।

अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां

निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्॥ १९

gā gopakairanuvanaṃ nayatorudāra-

veṇusvanaiḥ kalapadaistanubhṛtsu sakhyaḥ|

aspandanaṃ gatimatāṃ pulakastarūṇāṃ

niryogapāśakṛtalakṣaṇayorvicitram|| 19

अर्थ

अरी सखी! इन साँवरे-गोरे किशोरोंकी तो गति ही निराली है। जब वे सिरपर नोवना (दुहते समय गायके पैर बाँधनेकी रस्सी) लपेटकर और कंधोंपर फंदा (भागनेवाली गायोंको पकड़नेकी रस्सी) रखकर गायोंको एक वनसे दूसरे वनमें हाँककर ले जाते हैं, साथमें ग्वालबाल भी होते हैं और मधुर-मधुर संगीत गाते हुए बाँसुरीकी तान छेड़ते हैं, उस समय मनुष्योंकी तो बात ही क्या अन्य शरीरधारियोंमें भी चलनेवाले चेतन पशु-पक्षी और जड नदी आदि तो स्थिर हो जाते हैं, तथा अचल-वृक्षोंको भी रोमांच हो आता है। जादूभरी वंशीका और क्या चमत्कार सुनाऊँ?॥ १९॥✎ 1665

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1665 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्नान-पानके → स्नानपानके

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