श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तडित्वन्तो महामेघाश्‍चण्डश्‍वसनवेपिताः।

प्रीणनं जीवनं ह्यस्य मुमुचुः करुणा इव॥ ६

taḍitvanto mahāmeghāścaṇḍaśvasanavepitāḥ|

prīṇanaṃ jīvanaṃ hyasya mumucuḥ karuṇā iva|| 6

अर्थ

जैसे दयालु पुरुष जब देखते हैं कि प्रजा बहुत पीड़ित हो रही है, तब वे दयापरवश होकर अपने जीवन-प्राणतक निछावर कर देते हैं— वैसे ही बिजलीकी चमकसे शोभायमान घनघोर बादल तेज हवाकी प्रेरणासे प्राणियोंके कल्याणके लिये अपने जीवनस्वरूप जलको बरसाने लगे॥ ६॥✎ 1980 2078

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1980 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अपनी → अपने
  • #2078 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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