श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

अखण्डमण्डलो व्योम्‍नि रराजोडुगणैः शशी।

यथा यदुपतिः कृष्णो वृष्णिचक्रावृतो भुवि॥ ४४

akhaṇḍamaṇḍalo vyomni rarājoḍugaṇaiḥ śaśī|

yathā yadupatiḥ kṛṣṇo vṛṣṇicakrāvṛto bhuvi|| 44

अर्थ

परीक्षित्! जैसे पृथ्वीतलमें यदुवंशियोंके बीच यदुपति भगवान् श्रीकृष्णकी शोभा होती है, वैसे ही आकाशमें तारोंके बीच पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होने लगा॥ ४४॥✎ 2079

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2079 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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