श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

शरदर्कांशुजांस्तापान् भूतानामुडुपोऽहरत्।

देहाभिमानजं बोधो मुकुन्दो व्रजयोषिताम्॥ ४२

śaradarkāṃśujāṃstāpān bhūtānāmuḍupo'harat|

dehābhimānajaṃ bodho mukundo vrajayoṣitām|| 42

अर्थ

शरद् ऋतुमें दिनके समय बड़ी कड़ी धूप होती, लोगोंको बहुत कष्ट होता; परन्तु चन्द्रमा रात्रिके समय लोगोंका सारा सन्ताप वैसे ही हर लेते—जैसे देहाभिमानसे होनेवाले दुःखको ज्ञान और भगवद्विरहसे होनेवाले गोपियोंके दुःखको श्रीकृष्ण नष्ट कर देते हैं॥ ४२॥

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