॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.20.31
प्रावृट्श्रियं च तां वीक्ष्य सर्वभूतमुदावहाम्।
भगवान् पूजयांचक्रे आत्मशक्त्युपबृंहिताम्॥ ३१
prāvṛṭśriyaṃ ca tāṃ vīkṣya sarvabhūtamudāvahām|
bhagavān pūjayāṃcakre ātmaśaktyupabṛṃhitām|| 31
अर्थ
वर्षा ऋतुमें बैल, बछड़े और थनोंके भारी भारसे थकी हुई गौएँ थोड़ी ही देरमें भरपेट घास चर लेतीं और हरी-हरी घासपर बैठकर ही आँख मूँदकर जुगाली करती रहतीं। वर्षा ऋतुकी सुन्दरता अपार थी। वह सभी प्राणियोंको सुख पहुँचा रही थी। इसमें सन्देह नहीं कि वह ऋतु, गाय, बैल, बछड़े—सब-के-सब भगवान्की लीलाके ही विलास थे। फिर भी उन्हें देखकर भगवान् बहुत प्रसन्न होते और बार-बार उनकी प्रशंसा करते॥ ३०-३१॥