श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

व्यमुंचन् वायुभिर्नुन्‍ना भूतेभ्योऽथामृतं घनाः।

यथाऽऽशिषो विश्पतयः काले काले द्विजेरिताः॥ २४

vyamuṃcan vāyubhirnunnā bhūtebhyo'thāmṛtaṃ ghanāḥ|

yathā''śiṣo viśpatayaḥ kāle kāle dvijeritāḥ|| 24

अर्थ

वायुकी प्रेरणासे घने बादल प्राणियोंके लिये अमृतमय जलकी वर्षा करने लगते हैं—जैसे ब्राह्मणोंकी प्रेरणासे धनी लोग समय-समयपर दानके द्वारा प्रजाकी अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं॥ २४॥✎ 1664

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