॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.20.22
सरस्स्वशान्तरोधस्सु न्यूषुरंगापि सारसाः।
गृहेष्वशान्तकृत्येषु ग्राम्या इव दुराशयाः॥ २२
sarassvaśāntarodhassu nyūṣuraṃgāpi sārasāḥ|
gṛheṣvaśāntakṛtyeṣu grāmyā iva durāśayāḥ|| 22
अर्थ
परीक्षित्! तालाबोंके तट, काँटे-कीचड़ और जलके बहावके कारण प्रायः अशान्त ही रहते थे, परन्तु सारस एक क्षणके लिये भी उन्हें नहीं छोड़ते थे—जैसे अशुद्ध हृदयवाले विषयी पुरुष काम-धंधोंकी झंझटसे कभी छुटकारा नहीं पाते, फिर भी घरोंमें ही पड़े रहते हैं॥ २२॥✎ 1664