श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

लोकबन्धुषु मेघेषु विद्युतश्‍चलसौहृदाः।

स्थैर्यं न चक्रुः कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विव४॥ १७

lokabandhuṣu megheṣu vidyutaścalasauhṛdāḥ|

sthairyaṃ na cakruḥ kāminyaḥ puruṣeṣu guṇiṣviva|| 17

अर्थ

यद्यपि बादल बड़े लोकोपकारी हैं, फिर भी बिजलियाँ उनमें स्थिर नहीं रहतीं—ठीक वैसे ही, जैसे चपल अनुरागवाली कामिनी स्त्रियाँ गुणी पुरुषोंके पास भी स्थिरभावसे नहीं रहतीं॥ १७॥✎ 1664

टिप्पणियाँ

  1. ४

    गुणेष्वपि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 260)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1664 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आदेशा-नुसार → आदेशानुसार

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