श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलंकृतम्।

रोहिणी वसुदेवस्य भार्याऽऽस्ते नन्दगोकुले।

अन्याश्‍च कंससंवि‌ग्‍ना विवरेषु वसन्ति हि२॥ ७

gaccha devi vrajaṃ bhadre gopagobhiralaṃkṛtam|

rohiṇī vasudevasya bhāryā''ste nandagokule|

anyāśca kaṃsasaṃvignā vivareṣu vasanti hi|| 7

अर्थ

‘देवि! कल्याणी! तुम व्रजमें जाओ! वह प्रदेश ग्वालों और गौओंसे सुशोभित है। वहाँ नन्दबाबाके गोकुलमें वसुदेवकी पत्‍नी रोहिणी निवास करती हैं। उनकी और भी पत्‍नियाँ कंससे डरकर गुप्त स्थानोंमें रह रही हैं॥ ७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    याः।

    (मुद्रित पृष्ठ 129)

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