श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दिष्ट्याम्ब ते कुक्षिगतः परः पुमा-

नंशेन साक्षाद् भगवान् भवाय नः।

मा भूद् भयं भोजपतेर्मुमूर्षो-

र्गोप्ता यदूनां भविता तवात्मजः॥ ४१

diṣṭyāmba te kukṣigataḥ paraḥ pumā-

naṃśena sākṣād bhagavān bhavāya naḥ|

mā bhūd bhayaṃ bhojapatermumūrṣo-

rgoptā yadūnāṃ bhavitā tavātmajaḥ|| 41

अर्थ

[देवकीजीको सम्बोधित करके] ‘माताजी! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपकी कोखमें हम सबका कल्याण करनेके लिये स्वयं भगवान् पुरुषोत्तम अपने ज्ञान, बल आदि अंशोंके साथ पधारे हैं। अब आप कंससे तनिक भी मत डरिये। अब तो वह कुछ ही दिनोंका मेहमान है। आपका पुत्र यदुवंशकी रक्षा करेगा’॥ ४१॥

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