श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्‍च चिन्तयन्

नामानि रूपाणि च मंगलानि ते।

क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-

राविष्टचेता न भवाय कल्पते॥ ३७

śṛṇvan gṛṇan saṃsmarayaṃśca cintayan

nāmāni rūpāṇi ca maṃgalāni te|

kriyāsu yastvaccaraṇāravindayo-

rāviṣṭacetā na bhavāya kalpate|| 37

अर्थ

जो पुरुष आपके मंगलमय नामों और रूपोंका श्रवण, कीर्तन, स्मरण और ध्यान करता है और आपके चरणकमलोंकी सेवामें ही अपना चित्त लगाये रहता है—उसे फिर जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्रमें नहीं आना पड़ता॥ ३७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें