श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा

क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य।

सत्त्वोपपन्‍नानि सुखावहानि

सतामभद्राणि मुहुः खलानाम्॥ २९

bibharṣi rūpāṇyavabodha ātmā

kṣemāya lokasya carācarasya|

sattvopapannāni sukhāvahāni

satāmabhadrāṇi muhuḥ khalānām|| 29

अर्थ

आप ज्ञानस्वरूप आत्मा हैं। चराचर जगत‍्के कल्याणके लिये ही अनेकों रूप धारण करते हैं। आपके वे रूप विशुद्ध अप्राकृत सत्त्वमय होते हैं और संत पुरुषोंको बहुत सुख देते हैं। साथ ही दुष्टोंको उनकी दुष्टताका दण्ड भी देते हैं। उनके लिये अमंगलमय भी होते हैं॥ २९॥

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